कोरोना में जहां अस्पतालों का भारी-भरकम बिल आ रहा है, वहीं दूसरी ओर मरीजों को बीमा कंपनियों से भी परेशानी हो रही है। कई अस्पतालों द्वारा इलाज के लिए ज्यादा खर्चा लिया जा रहा है। इससे मेडिक्लेम पॉलिसी भी मरीजों को नहीं बचा पा रही है। मरीजों को बीमा कंपनियों द्वारा क्लेम का आधा पैसा ही मिल रहा है।
इलाज के लिए बीमा क्लेम की औसत राशि 1.56 लाख रुपए आ रही है
जानकारी के मुताबिक अब मेडिकल इंश्योरेंस पॉलिसी ही मरीजों के लिए काफी नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि कोविड-19 के लिए बीमा कंपनियों की औसत सेटलमेंट राशि 90 हजार 118 रुपए है। जबकि औसतन क्लेम 1.56 लाख रुपए का किया जा रहा है। इस तरह से मरीजों के लिए यह एक नई परेशानी है। सेटलमेंट की रकम बीमा कंपनी को देनी होती है। जबकि क्लेम का औसत बिल अस्पताल से मिलता है। ऐसे में अब क्लेम और सेटलमेंट के बीच जो अंतर है, वह मरीजों को अपनी जेब से देना पड रहा है।
9 जून तक कोविड के 11,405 मामले
आंकड़े बताते हैं कि 9 जून तक कोविड के 11,405 मामलों में अस्पताल का कुल करीबन 178 करोड़ रुपए का बिल हुआ है। इसमें से 58 करोड़ रुपए के 6,495 क्लेम का निपटारा (सेटलमेंट) किया गया है। अकेले महाराष्ट्र में ही बीमा कंपनियों को 6,361 क्लेम मिला है। इसमें से 3,099 क्लेम का सेटलमेंट किया गया है। 1,919 क्लेम के साथ दिल्ली दूसरे नंबर पर है। इसमें से 1,407 क्लेम का सेटलमेंट हो चुका है।
मरीजों के सामने नई चुनौतियां
सूत्रों के मुबाकि कोरोना वायरस के कारण बीमा कंपनियों के सामने अलग-अलग चुनौतियां आई हैं। बिमारी के खर्च के लिए बीमा कंपनियां आसानी से क्लेम का पेमेंट नहीं कर रही हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई मरीज दिल्ली के अस्पताल में भर्ती है। उसका औसत क्लेम साइज 2.29 लाख रुपए का है। तो इसमें बीमा कंपनियां औसतन 50 प्रतिशत यानी 1.04 लाख रुपए का ही पेमेंट कर रही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि मरीज के पास मेडिकल इंश्योरेंस होने के बाद भी उसे इलाज पर हुए खर्च का 50 प्रतिशत खर्च अपनी जेब से करना होगा।
पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों से ज्यादा मेडिक्लेम
जिन राज्यों में मेडिकल क्लेम का ज्यादा बिल आ रहा है उसमें पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तेलंगाना, उड़ीसा और झारखंड शामिल हैं। एकमात्र क्लेम विदेश से आया है। यह क्लेम स्विटजरलैंड के एक अस्पताल से आया है। इस मरीज का बिल 11.85 लाख रुपए है। इसे देखते हुए सरकार मरीजों के इलाज पर होनेवाले खर्च पर एक सीमा तय करना चाहती है। अगर ऐसा होता है तो फिर यह अस्पतालों के लिए और मरीज दोनों के लिए दिक्कत पैदा कर सकता है। ऐसे में अस्पताल तय सीमा के बाद मरीज का इलाज करने से मना कर सकते हैं।
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